Chapter 2
राठौर मेंशन अब के लिए सिर्फ उसके पिता के दोस्त का घर नहीं रह गया था।
वो जगह अब उसकी आदत बन चुकी थी।
एक अजीब-सी आदत।
जिसे वो खुद भी समझ नहीं पा रहा था।
“फिर राठौर मेंशन जाना है?”
ने हैरानी से पूछा जब अद्वय स्कूल से आते ही अपना बैग रखकर तैयार होने लगा।
“हूँ।”
“कल भी तो गए थे।”
“तो?”
रिशिका कुछ सेकंड बेटे को देखती रहीं।
आठ साल का बच्चा किसी एक जगह जाने के लिए इतना desperate कैसे हो सकता है?
लेकिन अद्वय के चेहरे पर वही usual coldness थी।
ना excitement।
ना smile।
फिर भी उसकी आँखों में हल्की बेचैनी साफ दिख रही थी।
जैसे अगर वो आज वहाँ नहीं गया… तो कुछ गलत हो जाएगा।
“श्रेयंश!” रिशिका ने आवाज़ लगाई,
“देखिए अपने बेटे को। फिर राठौर मेंशन जा रहा है।”
अखबार से नज़र उठाकर हँसे।
“जाने दो। रिद्धार्थ के साथ रहता होगा।”
लेकिन उन्हें नहीं पता था…
अद्वय वहाँ रिद्धार्थ के लिए नहीं जाता था।
—
शाम तक वो राठौर मेंशन पहुँच चुका था।
जैसे ही अंदर कदम रखा, उसकी नज़र automatically पूरे हॉल में घूमी।
वो उसे ढूँढ रहा था।
हमेशा की तरह।
“अरे अद्वय!”
मुस्कुराए।
“आओ बेटा।”
अद्वय ने सिर हिलाया।
लेकिन उसकी आँखें अब भी searching mode में थीं।
“वृद्धि ऊपर है,” यतार्थ ने हँसते हुए कहा,
“तुम्हें आते ही वही याद आती है।”
अद्वय कुछ नहीं बोला।
वो सीधा ऊपर चला गया।
कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।
अंदर हल्की-सी lullaby चल रही थी।
अपने छोटे-से बिस्तर पर लेटी हुई थी।
उसकी आँखें खुली थीं।
और जैसे ही उसने अद्वय को देखा…
वो अचानक हाथ-पैर हिलाने लगी।
अद्वय दरवाज़े पर ही रुक गया।
उसके अंदर फिर वही strange feeling उठी।
वो धीरे-धीरे उसके पास गया।
“देखो तो…”
मुस्कुराईं,
“तुम्हें देखते ही खुश हो जाती है।”
अद्वय नीचे बैठ गया।
वृद्धि ने तुरंत उसकी उंगली पकड़ ली।
उसके छोटे-छोटे होंठों से हल्की-सी आवाज़ निकली… जैसे वो कुछ बोलने की कोशिश कर रही हो।
और अद्वय…
वो बस उसे देख रहा था।
बहुत ध्यान से।
जैसे दुनिया की सबसे जरूरी चीज़ उसके सामने हो।
“तुम्हें बच्चे इतने पसंद कब से आने लगे?” रिद्विका ने मज़ाक में पूछा।
“मुझे बच्चे पसंद नहीं।”
“तो फिर वृद्धि?”
कुछ सेकंड चुप्पी रही।
फिर उसने धीरे से कहा—
“वो अलग है।”
रिद्विका हल्का हँस दीं।
उन्हें वो जवाब cute लगा।
लेकिन उन्हें क्या पता था कि अद्वय सच बोल रहा था।
उसके लिए वृद्धि सच में अलग थी।
बहुत अलग।
—
दिन गुजरने लगे।
और अद्वय का राठौर मेंशन आना बढ़ता गया।
कभी homework के बहाने।
कभी रिद्धार्थ के नाम पर।
कभी बिना किसी वजह के।
लेकिन हर बार…
उसकी मंज़िल सिर्फ एक होती।
वृद्धि।
अगर वो सो रही होती तो वो चुपचाप उसके पास बैठ जाता।
अगर वो खेल रही होती तो दूर से उसे देखता रहता।
अगर कोई उसे गोद में लेता…
तो उसका mood खराब हो जाता।
धीरे-धीरे ये बात सब notice करने लगे थे।
“अरे भाई,” रिद्धार्थ ने एक दिन हँसते हुए कहा,
“तू मेरी बहन का bodyguard है क्या?”
अद्वय ने उसकी तरफ देखा।
“कोई problem है?”
रिद्धार्थ blink करने लगा।
“न-नहीं…”
उसकी उम्र सिर्फ दस साल थी…
लेकिन उसकी आँखों में अजीब seriousness थी।
ऐसी जो uncomfortable कर दे।
—
एक शाम राठौर परिवार garden में बैठा था।
वृद्धि घास पर बैठी अपने खिलौनों से खेल रही थी।
अद्वय थोड़ी दूरी पर उसे देख रहा था।
तभी पड़ोस की एक aunty आईं।
उन्होंने प्यार से वृद्धि को उठाने की कोशिश की।
वृद्धि तुरंत रोने लगी।
“अरे…” aunty परेशान हो गईं,
“मैंने क्या किया?”
लेकिन अद्वय अचानक उठकर उनके पास आया।
उसने बिना कुछ कहे वृद्धि को उनकी गोद से ले लिया।
और अगले ही पल…
वो शांत हो गई।
पूरा माहौल कुछ सेकंड के लिए चुप हो गया।
“वाह…” यतार्थ हँस पड़े,
“ये तो सच में अद्वय के पास ही शांत होती है।”
लेकिन अद्वय की नजरें उस औरत पर थीं।
उसे अच्छा नहीं लगा था कि किसी और ने वृद्धि को छुआ।
उसके अंदर irritation उठ रही थी।
और वो feeling हर दिन stronger होती जा रही थी।
—
उस रात…
रिद्धार्थ और अद्वय कमरे में वीडियो गेम खेल रहे थे।
“वैसे,” रिद्धार्थ अचानक बोला,
“जब तू बड़ा होगा ना, तेरी girlfriend बहुत डर जाएगी।”
अद्वय ने बिना expression के पूछा,
“क्यों?”
“क्योंकि तू बहुत possessive है।”
अद्वय चुप रहा।
रिद्धार्थ हँसा।
“तू अभी से वृद्धि को किसी के पास नहीं जाने देता।”
कुछ सेकंड silence रहा।
फिर अद्वय ने धीरे से कहा—
“उसे जाना भी नहीं चाहिए।”
रिद्धार्थ की हँसी धीरे-धीरे रुक गई।
“क्या मतलब?”
अद्वय ने उसकी तरफ देखा।
उसकी dark आँखें बिल्कुल calm थीं।
लेकिन उसी calmness में कुछ dangerous था।
“कुछ नहीं।”
उसने फिर game की तरफ देख लिया।
लेकिन रिद्धार्थ पहली बार थोड़ा uncomfortable महसूस कर रहा था।
—
दिन बीतते गए।
वृद्धि अब अद्वय को देखते ही मुस्कुराने लगी थी।
कभी उसकी शर्ट पकड़ लेती।
कभी उसकी उंगली।
और हर बार अद्वय के अंदर अजीब-सी शांति फैल जाती।
जैसे उसका पूरा दिन सिर्फ उसी पल के लिए हो।
एक दिन रिद्विका ने प्यार से कहा,
“लगता है तुम्हारे बिना नहीं रहती हमारी बेटी।”
अद्वय ने तुरंत पूछा,
“क्यों?”
“क्योंकि तुम जाते हो तो रोती है।”
उसके होंठों पर हल्की-सी smile आई।
बहुत हल्की।
शायद पहली बार।
“अच्छा।”
रिद्विका ने notice किया।
अद्वय कभी किसी के सामने smile नहीं करता था।
लेकिन वृद्धि के नाम पर उसके चेहरे पर softness आ जाती थी।
उन्हें वो bond innocent लगा।
एक बड़े भाई जैसा।
लेकिन उन्हें नहीं पता था…
ये attachment normal नहीं थी।
—
उस शाम अद्वय जाने लगा तो वृद्धि उसकी उंगली पकड़कर रोने लगी।
“अरे…” रिद्विका हँसीं,
“देखा? जाने नहीं दे रही।”
लेकिन अद्वय नहीं हँसा।
उसने नीचे देखा।
वृद्धि सच में उसे छोड़ नहीं रही थी।
उसकी
छोटी-सी उंगलियाँ कसकर उसकी उंगली पकड़े थीं।
और पता नहीं क्यों…
अद्वय के अंदर अचानक एक dangerous thought आया—
अगर वो हमेशा ऐसे ही उसे पकड़कर रखे तो?
अगर वो कभी उससे दूर ही ना जाए?
उसकी उम्र इतनी नहीं थी कि वो उन emotions को समझ सके।
लेकिन obsession धीरे-धीरे उसके अंदर जड़ें जमा रहा था।
बहुत गहरी।
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