Chapter 1
राठौर मेंशन आज रोशनी से जगमगा रहा था।
पूरा घर सफेद और सुनहरे फूलों से सजा हुआ था। बड़े-बड़े झूमर हॉल की छत से चमक रहे थे। हर तरफ लोगों की हँसी, धीमा संगीत और बधाइयों की आवाज़ें गूँज रही थीं।
आज राठौर परिवार अपनी बेटी के जन्म की खुशी मना रहा था।
लेकिन उस भीड़ में एक बच्चा बिल्कुल अलग खड़ा था।
Advay Wadhwa।
आठ साल का अद्वय अपनी उम्र के बच्चों जैसा नहीं था। जहाँ बाकी बच्चे भाग रहे थे, चिल्ला रहे थे, वहीं वो हॉल के कोने में खड़ा सबको शांत आँखों से देख रहा था।
काले रंग का छोटा-सा सूट, हाथ जेब में और चेहरे पर अजीब-सी गंभीरता।
“अद्वय!”
पीछे से आवाज़ आई तो उसने पलटकर देखा।
Shreyansh Wadhwa उसके पास आए और उसके बाल पीछे करते हुए बोले, “इतना अकेला क्यों खड़ा है? जाओ, रिद्धार्थ के साथ खेलो।”
अद्वय ने सामने देखा जहाँ Riddarth Rathore बाकी बच्चों के साथ हँस रहा था।
उसने धीमे से कहा, “मन नहीं है।”
श्रेयंश हल्का मुस्कुराए। “तू कभी normal बच्चा बनेगा भी?”
अद्वय ने जवाब नहीं दिया।
उसे हमेशा से शोर पसंद नहीं था।
उसकी आँखें धीरे-धीरे पूरे हॉल में घूम रही थीं… जैसे वो किसी चीज़ को ढूँढ रही हों।
तभी ऊपर सीढ़ियों से उतरती हुई Ridvika दिखाई दीं।
उनकी गोद में एक छोटी-सी बच्ची थी।
सफेद फ्रॉक में लिपटी हुई।
गुलाबी गाल।
छोटी-छोटी उंगलियाँ।
और बड़ी-बड़ी शांत आँखें।
अद्वय की नज़र वहीं रुक गई।
जैसे पूरी दुनिया अचानक धीमी हो गई हो।
उसे पहली बार समझ नहीं आया कि वो क्यों देख रहा है… लेकिन उसकी आँखें हट नहीं रही थीं।
“देखिए ना, बिल्कुल परी लग रही है मेरी बेटी।”
रिद्विका प्यार से मुस्कुराईं।
लोग बच्ची को देखकर खुश हो रहे थे।
लेकिन अद्वय बस उसे देख रहा था।
बहुत देर तक।
“ये कौन है?”
उसने धीरे से पूछा।
श्रेयंश ने उसकी तरफ देखा। “राठौर अंकल की बेटी। वृद्धि।”
वृद्धि।
नाम सुनते ही पता नहीं क्यों उसके अंदर अजीब-सी हलचल हुई।
उसी पल छोटी-सी वृद्धि ने अपनी आँखें उठाईं।
सीधे अद्वय की तरफ।
और वो जम गया।
उसकी उम्र सिर्फ आठ साल थी… मगर उस पल उसे पहली बार ऐसा लगा जैसे उसने किसी बहुत जरूरी चीज़ को देख लिया हो।
कुछ ऐसा… जिसे वो खोना नहीं चाहता।
रिद्विका हँसते हुए उसके पास आईं। “मिलोगे वृद्धि से?”
अद्वय कुछ नहीं बोला।
वो बस बच्ची को देखता रहा।
फिर धीरे-धीरे उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
वृद्धि ने अपनी छोटी-सी उंगलियाँ उसकी उंगली के चारों तरफ लपेट लीं।
कसकर।
उस पल अद्वय के अंदर कुछ बदल गया।
उसकी साँस हल्की-सी अटक गई।
इतनी छोटी पकड़… फिर भी पता नहीं क्यों उसे ऐसा लगा जैसे वो इस हाथ को कभी छोड़ना नहीं चाहता।
“अरे वाह…”
Yatarth Rathore हँस पड़े। “लगता है हमारी बेटी को अद्वय पसंद आ गया।”
सब मुस्कुरा दिए।
लेकिन अद्वय नहीं मुस्कुराया।
उसकी नज़र अब भी वृद्धि पर थी।
जैसे वो दुनिया की बाकी हर चीज़ भूल चुका हो।
“अद्वय!”
रिद्धार्थ भागता हुआ आया। “चल क्रिकेट खेलते हैं।”
“नहीं।”
“क्यों?”
“बस।”
रिद्धार्थ ने भौंहें सिकोड़ लीं। “तू उसे इतना क्यों देख रहा है?”
अद्वय ने पहली बार उसकी तरफ देखा।
उसकी आवाज़ धीमी थी… लेकिन अजीब तरह से सख्त।
“शोर मत करो।”
रिद्धार्थ चुप हो गया।
उसे समझ नहीं आया कि अद्वय अचानक ऐसा क्यों behave कर रहा था।
उधर वृद्धि अब भी उसकी उंगली पकड़े शांत थी।
जैसे वो उसे पहचानती हो।
और वही चीज़ अद्वय को अंदर तक अजीब महसूस करा रही थी।
—
कुछ देर बाद एक और औरत वृद्धि को गोद में लेने लगी।
जैसे ही उसने बच्ची को उठाया…
वृद्धि रोने लगी।
जोर-जोर से।
रिद्विका उसे शांत कराने लगीं लेकिन वो लगातार रो रही थी।
अद्वय की आँखें उसी औरत पर टिक गईं।
उसे अच्छा नहीं लगा।
बिल्कुल भी नहीं।
“मुझे दीजिए।”
उसकी अचानक आई आवाज़ से सबने उसकी तरफ देखा।
“क्या?” रिद्विका हल्का हँसीं।
“मुझे दीजिए।”
इस बार उसकी आवाज़ और धीमी थी।
कुछ सेकंड बाद रिद्विका ने मुस्कुराते हुए वृद्धि को उसकी गोद में दे दिया।
और जैसे ही वृद्धि उसके पास आई…
वो शांत हो गई।
पूरा हॉल कुछ पल के लिए चुप हो गया।
“अरे…” यतार्थ हँसे, “ये तो सच में अद्वय के पास ही शांत होती है।”
लेकिन अद्वय कुछ नहीं बोला।
वो बस नीचे देख रहा था।
वृद्धि उसकी शर्ट पकड़े उसके सीने से लगी हुई थी।
और उसके अंदर अजीब-सी possessiveness जन्म ले चुकी थी।
उसे अच्छा नहीं लग रहा था कि कोई और उसे छुए।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्यों।
लेकिन वो feeling बहुत strong थी।
—
रात काफी हो चुकी थी।
धीरे-धीरे सारे मेहमान जाने लगे।
लेकिन अद्वय अब भी वहीं था।
राठौर मेंशन के ऊपर वाले हिस्से में।
वृद्धि के कमरे के बाहर।
दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था।
अंदर हल्की पीली रोशनी थी।
वृद्धि अपने छोटे-से पालने में सो रही थी।
अद्वय दरवाज़े के पास खड़ा उसे देख रहा था।
बिना पलक झपकाए।
“अद्वय।”
पीछे से श्रेयंश आए।
“घर चलना है।”
अद्वय ने धीरे से पूछा, “सो गई?”
श्रेयंश बेटे को देखकर हल्का मुस्कुराए। “हाँ।”
लेकिन अद्वय वहीं खड़ा रहा।
कुछ सेकंड बाद उसने बहुत धीरे कहा—
“बहुत सुंदर है।”
श्रेयंश हँस पड़े। “अच्छा? इतनी पसंद आ गई?”
अद्वय ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसकी नज़र अब भी सोती हुई वृद्धि पर थी।
फिर उसने अचानक कहा—
“मैं इसे किसी को नहीं दूँगा।”
श्रेयंश पहले तो हँसे…
फिर बेटे की आँखें देखकर उनकी हँसी थोड़ी रुक गई।
उसकी आवाज़ मज़ाक जैसी नहीं थी।
वो सच बोल रहा था।
एक आठ साल का बच्चा…
पूरी seriousness से।
“पागल लड़का।”
श्रेयंश ने उसके सिर पर हाथ रखा। “चलो अब।”
लेकिन जाते वक्त भी अद्वय ने आखिरी बार पलटकर वृद्धि को देखा।
और उसके अंदर एक silent promise बन चुका था।
वो हमेशा उसके पास रहेगा।
हमेशा।
—
उस रात अद्वय सो नहीं पाया।
बार-बार वही आँखें उसके दिमाग में आ रही थीं।
वही छोटी-सी उंगलियाँ।
वही soft चेहरा।
उसने करवट बदली।
फिर दूसरी।
लेकिन बेचैनी
खत्म नहीं हुई।
आखिर वो उठकर खिड़की के पास चला गया।
बाहर बारिश हो रही थी।
ठंडी हवा अंदर आई।
लेकिन उसके अंदर कुछ और ही चल रहा था।
उसकी उम्र इतनी नहीं थी कि वो उन feelings को समझ सके।
लेकिन एक चीज़ वो समझ गया था—
उसे वृद्धि चाहिए।
बार-बार।
हर दिन।
और शायद हमेशा।
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